अर्जुन के अहंकार को तोड़ने के लिए भगवान कृष्ण ने रची ऐसी माया
अन्तर्यामी भगवान कृष्ण जो सनातन धर्म की स्थापना करने के लिए आए थे और पांडव उनके मित्र ही नहीं बल्कि भाई के सामान थे यदि उनके अंदर कोई दुर्गुण आ जाए तो कृष्ण को पता चले बिना रह नहीं सकता था। जिस प्रकार रावण का अहंकार उसकी मृत्यु का कारण बन गया उसी तरह अर्जुन के अंदर भी अपनी ताकत का भ्रम जन्म ले चूका था जो श्री कृष्ण जानते थे इसलिए उन्होंने एक योग माया रची।
भगवान श्री कृष्ण के पास एक बाहृमण आया और कहने लगा कि मेरे घर में कोई भी बालक जन्म लेता और मर जाता है तब कृष्ण बोले कि यह सब नियति का खेल है जिसके विरुद्ध कोई नहीं जा सकता। जब कृष्ण के मित्र अर्जुन को इस बात का पता चला तो उन्होंने बाह्रमण को वचन दिया कि वो उसके पुत्रों की रक्षा करेंगे अन्यथा आत्मदाह कर दूँगा। दरअसल में यह अर्जुन का अभिमान बोल रहा था क्योंकि वह अपने आप को श्रेष्ठ योद्धा समझता था।
जब अगली बार बाह्रमण की पत्नी का प्रसव हुआ तब यमराज आए और उस जन्मे बालक के प्राण लेकर गए जिससे अर्जुन अपने आप को कायर समझते हुए आत्मदाह करने लगा। तभी भगवान कृष्ण ने वहाँ आकर अर्जुन को रोका और कहा कि हे कुंती पुत्र यह सब मेरी माया थी तुम्हारे अभिमान को नष्ट करने के लिए मुझे यह माया रचनी पड़ी। इस संसार में कोई भी व्यक्ति कितना भी बलवान और बुद्धिशाली क्यों न हो परन्तु वह इस कुदरत के विरुद्ध कार्य नहीं कर सकता इसलिए तुम अपने आप को श्रेष्ठ समझने का अहंकार त्याग दो।
कृष्ण की बात अर्जुन पूरी तरह से समझ गए और उनके पैर छू कर माफ़ी मांगने लगे। दोस्तों यही बात आज के समय में भी लागु होती है क्योंकि चंद रूपए और ताकत आने पर लोग अपने आप को राजा समझने लगते है लेकिन वे इस बात को भूल जाते है कि अंत में उन्हें भी राख ही बनना पड़ेगा। इसलिए कुदरत के नियम के अनुसार चलना ही बुद्धिमता है यदि आपको यह जानकारी पसंद आए तो नीचे दिया फॉलो का बटन जरूर दबाए।