जानिए कैसे हुआ था शक्तिशाली रावण का जन्म?

शक्तिशाली रावण का जन्म रावण सबसे बलवान और शक्तिशाली शासक होने के बावजूद मारा गया क्योंकि उसकी हट और महान बनने की अभिलाषा ही उसे ले डूबी। वह सभी देवताओं को अपना परम् शत्रु मानता था। रावण के जन्म होने से पहले ही उसका निर्धारण हो चूका था जो श्राप उसको मिले थे वह तो देव योग मात्र होते थे विश्राव ऋषि के कहने पर लंका बनाई गयी जहाँ कुबेर निवास करते थे और सभी राक्षस पाताल लोक में रहते थे।

जानिए कैसे हुआ था शक्तिशाली रावण का जन्म?


सुमाली राक्षस ने सोचा कि आखिर कब तक हम यहाँ पाताल में रहेंगे इसलिए उन्हें सोचा कि यदि मेरी पुत्री कैकसी का विवाह विश्रवा ऋषि ने हो जाये तो ऐसा पुत्र प्राप्त होगा जो तीनों लोको पर राज करेगा। सुमाली ने अपनी युक्ति कैकसी को बताई तो उसने अपने पिता की आज्ञा को मानते हुए विश्रवा ऋषि के पास चली गयी और उन्हें विवाह का आग्रह करने लगी।

विश्रवा ऋषि के कैकसी को बताया कि यदि यह विवाह हुआ तो हमारे पुत्र राक्षसी होंगे लेकिन कैकसी कहने लगी कि आप जैसे महात्मा पुरुष से मैं ऐसे पुत्र नहीं चाहती इसलिए मुझ पर कृपा करे। विश्रवा ने बताया कि हमारे तीन पुत्रों में एक पुत्र ऐसा होगा जो मेरी तरह धर्मात्मा होगा इसके बाद विश्रवा ऋषि और कैकसी का विवाह हुआ।

नीति के अनुसार कैकसी के तीन पुत्र हुए जिसमे रावण के दस सर होने से उसे दसग्रीव भी कहते है और दूसरा कुम्भकरण हुआ। तीसरा पुत्र विभीषण जो अपने पिता विश्रवा की तरह धर्मात्मा हुआ। उसने अधर्म के कार्यों में रावण का कभी साथ नहीं दिया इसलिए रावण ने उसे राज्य से बहार निकाल दिया था।
तीनों भाइयों का आचरण अलग हुआ जिसमे रावण दुराचार के कार्य करता और कुम्भकरण सदैव भूखा रहता इसलिए जो इंसान उसके सामने आता उसको खा जाता है परन्तु छोटा भाई विभीषण भक्ति में लीन रहता था। एक समय विश्रवा ऋषि की पहली पत्नी के पुत्र कुबेर रावण और माता कैकसी से मिलने आते है तब कुबेर के ऐश्वर्य को देख रावण की माता उनके पुत्रों से कहती है कि देखो तुम्हारा जयेष्ठ भाई कितना कीर्तिवान है। यह सुन रावण के अभिमान को ठेश लगती है और वह तप करके उनसे अधिक बलवान बनने की प्रतिज्ञा लेता है।
रावण के साथ उसके दोनों भाई भी गोकर्ण आश्रम में बह्रमा की तपस्या में लीन हो जाते है रावण बह्रमा को प्रसन्न करने के लिए अपने दस हज़ार वर्षों तक तप करता है और एक हज़ार वर्ष के अंत में अपने एक सर की आहुति दे देता है। इस तरह रावण के नौ सर की आहुति देने के बाद जब वह दसवे हर की आहुति देने लगता है तो बह्रमा उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उससे वरदान मांगने के लिए कहते है। रावण भगवान से अमरता का वरदान मांग लेता है लेकिन भगवान उससे मना कर देते है क्योंकि जो पैदा हुआ है उसका अंत निश्चित है।

इसलिए रावण दूसरा वरदान मांगते हुए कहता है कि मनुष्य को छोड़ कोई उसका वध नहीं कर सके और बह्रमा उसको वरदान दे देते है और इसी के साथ बह्रमा ने रावण की नाभि में एक अमृत कुंड स्थापित किया। जब तक उसकी नाभि में वह अमृत है तब तक रावण की मृत्यु नहीं हो सकती थी।

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