चित्तौड़गढ़ की महारानी पद्मिनी की वीरगाथा सुनकर गर्व होगा आपको rani padmini life history in hindi
दुनिया के इतिहास क्षत्रियों ने कभी हार नहीं मानी ऐसा ही एक अनसुना इतिहास महारानी पदमिनी खिलजी वंश के दूसरे शासक के बीच हुआ जब खिलजी ने महारानी को प्राप्त करने के लिए चित्तौड़गढ़ पर चढाई शुरू की और छल के द्वारा उनके राज्य में प्रवेश कर गया। परन्तु महारानी अपनी सूझ-बुझ से हारकर भी विजयी हुई।
रानी पद्मिनी का इतिहास
बात सन 1303 की है जब दिल्ली के खिलजी ने चित्तौड़गढ़ पर चढ़ाई की जिसका वर्णन मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा लिखे ''पद्मावत'' में इसका वर्णन है। जब महाराणा रतन सिंह को इस बारे में पता चला तो उन्होंने अपनी भाई और पुत्रों के साथ पुरे मेवाड़ की सुरक्षा चालू की जिससे 6 महीने तक अलाउद्दीन अपने मुकाम में सफल नहीं हो सका। इसलिए उसने छल करके रतन सिंह के पास संधि का प्रस्ताव भेजा और रतन सिंह को बंदी बना लिया।
अलाउद्दीन खिलजी और रानी पद्मावती
अलाउद्दीन ने महाराजा को छोड़ने के लिए शर्त रखी कि यदि रानी पद्मिनी हमारे पड़ाव में आएंगी तभी हम उन्हें छोड़ेंगे इसलिए पद्मावति ने भी उसी की तरह एक चाल खेली और शर्त रखी कि वह अपने साथ दासियों को लेकर आएगी। अलाउद्दीन ने रानी की बात को स्वीकार किया और रानी दासियों के साथ पालकी में उनके पड़ाव में आयी लेकिन उस पालकी में दासियो की जगह शस्त्र के साथ योद्धा बैठे हुए थे और वे खिलजी की सेना पर भूखे शेरों की तरह टूट पड़े।
महाराणा रतन सिंह बंदीगृह से आज़ाद हो गए थे और लगातार 6 महीनों तक युद्ध जारी रहा जिससे अन्न का भंडार खाली हो गया और सभी क्षत्रियों रानियों ने मिलकर एक चिता तैयार की और अपने प्राणों का त्याग कर दिया। छह मास के बाद खिलजी जीत की ख़ुशी में वहाँ पहुँचा लेकिन उसकी विजय के गान करने वाला कोई स्त्री-पुरुष जीवित नहीं था इस तरह अलाउद्दीन जीत कर भी हार गया। महारानी पदमिनी की बहादुरी का इतिहास आज भी प्राचीन पन्नों में दर्ज़ है।